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Rajasthan Board Class 10th Science Notes Chapter- 4 प्रतिरक्षा एंव रक्त समूह

Chapter- 4 प्रतिरक्षा एंव रक्त समूह

प्रतिरक्षा विज्ञान :- रोगानुशों के उन्मूलन हेतु शरीर में होने वाली क्रियाओं तया संबधित तंत्र के अध्ययन को प्रतिरक्षा विज्ञान कहा जाता है।

शरिर में दो प्रकार की प्रतिरक्षा विधियां कार्य करती है।


(अ) स्वाभाविक प्रतिरक्षा विधि:


  • यह जन्मनात्त प्रतिरक्षा विधि है।
  • इसे सामान्य या प्राकृतिक प्रतिरक्षा भी कहा जाता है।
  • यह प्रतिरक्षा किसी विशेष रोगाण से विशिष्ट रूप से रक्षा प्रदान नही करती है।
  • यह सभी प्रतिजनों के विरत समान तरिके से कार्य करती है। स्वाभाविक प्रतिरक्षा के लिए निम्न कारक सहायक होते है।


(i) भौतिक अवरोधक :- जैसे त्वया , नासिका विद्रों तथा अन्य अंगों में पाए जाने वाले पक्ष्माभ व कशाभ , श्लेष्म उपकला आदि ।

(2) रासायनिक अवरोधक:- असे आमाश्य में पाए जाने वाले अम्ल, आमाश्य व योनि का अम्लीय वातावरण, त्वचा पर पाए जाने वाले रासायनिक तत्व, विभिन्न  देह तरलों जैसे लार , पसीना आदि।
(3) कोशिका अवरोधक :- भतकागु क्रिया में सक्षम कोशिकाएं जैसे-महाभक्षक, मोनोसाइटः, न्यूट्रोफिल कोशिकाएँ आदि
(4) ज्वर , सूजन आदि

(ब) उपार्जित प्रतिरक्षा विधि :- यह अनुकूली अथवा विशिष्ट प्रतिरक्षा भी कहलाती है।


  • इस प्रकार कि प्रतिरक्षा में एक पोषक किसी विशेष सूक्ष्मजीव अथवा बाहय पदार्य के प्रति अत्यंत विशिष्ट प्रद्यात करता है।
  • इस प्रतिरक्षा में प्रतिरक्षीय का निर्माण किया जाता है।


विशिष्ट प्रतिरक्षा दो प्रकार की होती है।


सक्रिय प्रतिरक्षा : ऐसी- प्रतिरक्षा प्रणाली जिसमें मानव शरीर प्रतिजन के विरुद्ध स्वंय पतिरक्षियों का निर्मान करता है।

निष्क्रिय प्रतिरक्षा :- ऐसी प्ततिरक्षा प्रणाली में मानव शरिर में किसी विशेष प्रतिजन के विरद्ध बाहर से विशिष्ट प्रतिरक्षी प्रविष्ट करवाए जाते है। 

प्रतिजन :- प्रतिजन वह बाहरी रोगाणु प्रदार्थ है। जिनका आणविक भार 6000 डॉल्टन अथवा उससे ज्यादा होता है। प्रतिजन विभिन्न रासायनिक संगठनों के हो सकते हैं। जैसे - प्रोटिन, पॉलीसेकेराइड. शर्करा , लिपिड या न्यूक्लिफ अम्ल कभी- कभी शरीर के अन्दर के पदार्थ तया कोशिकाएं भी प्रतिजन के तौर पर कार्य करती है। प्रतिजन सम्पूर्ण अणु के रूप में प्रतिरक्षी से प्रतिक्रिया नहीं करते इसके कुछ विशिष्ट अंशी प्रतिरक्षी से जुड़ते हैं इन अंशों को एण्टीजनी निर्धारक एपीटोप कहा जाता है। एक प्रोटिन में कई एटीमनी निर्धारक हो सकते है। इनकी संख्या को एन्टीजन की संयोजकता कहा जाता है। अंधिकाश जीवाणु एण्टीजनी संयोजकता 100 या अधिक होती है।


प्रतिरक्षी :- प्रतिरक्षी को इम्यूनोग्लोबिन भी कहा जाता है। ये प्लाविका कोशिकाओं द्वारा निर्मित गामा ग्लोबिन प्रोटिन है। जो पानियों के रक्त तथा अन्य तरल प्रदायों में पाए जाते है। प्रतिरक्षी का वह भाग जो प्रतिजन से क्रिया करता है। पैराटीप कहलाता है।

यह चार सरंचनात्मक इकाइयों से मिलकर बनी होती है।



आर. एच. कारक : आर एच कारक करीब पांच अमीनों अम्लों का एक प्रोटीन है।
जिसकी खोज मकाका रीसस नाम के बंदर में की गई थी।
यह प्रोटिन मानव की रक्त कणिकाएं की सतह पर भी पायी जाती है। मानव में पांच प्रकार के आर. एच. कारक पाए जाते हैं। Rh.D , Rh.E, Rh.e, Rh.c, Rh.c -



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